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चींटी चली , पहाड़ चढ़ने

By Jyoti Singh


लोगों के मन में यह बात पचती नहीं

एक छोटी - सी चींटी, कभी पहाड़ चढ़ती नहीं

पर चींटी ने तो मन में ठान लिया था

उस पहाड़ को ही अपना लक्ष्य मान लिया था

कभी ताकती,कभी हाँफती

रुक-रुक कर घरौंदे बनाती

देखा तो इस रास्ते पर भीड़ नहीं थी

वो तो अपनी ही धुन में चल पड़ी थी


लोगों ने बहुत टोका,बहुत समझाया

तू इतनी छोटी सी,वह इतनी बड़ी काया

मंज़िल ऐसी चुन,जिसे पूरा करना लाज़मी हो

न कर कुछ ऐसा, जिसका पछतावा बाद में हो


चींटी बोली, ' क्यों मुझे आगे जाने से रोकते हो? '

अपनी नाकामी का एक अंश, तुम मुझमें भी ढूंढते हो

क्यों तुमने मान लिया ,' ये मुझसे होगा नहीं '

अपने कुएं से बाहर झांककर कभी तुमने देखा नहीं


कुछ तुम्हे साबित नहीं करना चाहती हूँ

बस अपना घर, उस ऊंचाई पर बनाना चाहती हूँ





जाने कितनी कठिनाई और नाकामी तेरे हिस्से में आएगी

इतना दूर जाएगी , तो वापस भी नहीं आ पाएगी

अरे ! इतनी जिद क्यों करती है ??

कुछ ही दिनों में तेरा यह जूनून उतर जाएगा

एक छोटा सा पत्थर भी अगर गिर गया ,

तेरा काम वही ख़त्म हो जाएगा


है तेरा अनुमान सही ,

यूँ ही चलती रही , तो शायद मर जाऊँगी

पर न चली , तो हमेशा के लिए रूक जाऊँगी

रुकी हुई ज़िन्दगी से तो पथरीले रास्ते पर चलना भला है

पर तुझे क्या पता ? तू उठकर कभी ज़रा सा भी चला है ?


यह तपती धूप , बर्फीली हवा , झमाझम बारिश भी एक बहाना है

शायद भगवान् का मकसद भी मुझे ऊपर पहुँचाना है

पहुँच गई , तो तुझे भी वहां बुलाऊँगी

और न पहुंची ,

तो किसी और के अंदर मैं फिर से वापस आऊंगी


कहानी यूँ ही आगे बढ़ती गई ,

और चींटी पहाड़ चढ़ती गई


हर वो परेशान शख्स , जो उसे कोस रहा था

उसकी तालियों का स्वर आज हवाओं में गूँज रहा था

चलते-चलते नाकामी के हर चेहरे को वो पढ़ चुकी थी

अब रोने से क्या फायदा , चींटी तो पहाड़ चढ़ चुकी थी


By Jyoti Singh






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