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ख़ता-ए-दिल

By Mohd Shakeb ("Shauk-E-Shakeb")


दिल की ख़ता ये है, कि ये सबसे दिल से मिलता है

इस खुदगर्ज़ ज़माने में ये सबसे अपनेपन से मिलता है।


धोखा लाज़मी है, ये इल्म है इसको,

हर बार फिर भी, ये एक सा ही मिलता है।


इस बदलती दुनिया में, किरदार का खरीदार कोई नहीं है,

ये मासूम, बेवजह ही किरदार के साथ मिलता है।



हर किसी को आईना समझके, ये खुल के मिलता है,

भूल जाता है ये, कि आईना का भी दूसरा पहलू होता है।


सिसकता है फिर अकेले में, जब एक बार फिर धोखा मिलता है,

दूसरे की बद-करनी का इलज़ाम जब खुद पे होता है,

ये दिल की ख़ता ये है, जो ये सबसे दिल से मिलता है।


By Mohd Shakeb ("Shauk-E-Shakeb")



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